Friday, May 27, 2011

मरुवाणी

क्युं सतावो हो म्हने भारत वाळा
मैं पेला सुं भी घणी तंग होयोडी हुं...
जीवन म्हारौ खतरै मांय है....
मने ही क्युं मीळ्या आ दुःखा रा टोळा
अजी भी बाकी है कांइ म्हारे माथे जुल्मा रा झोळा
कांई भर देवणी चावौ हो म्हारी कोथळी दुःखा रे दहेज सु..
मत सतावौ म्हने भारत वाळा मैं पैला सुं ही परेशान हुं...
भुलै है सगळा मने म्हारा मीत.. मीटावणी चावै है मने ..
पांतरै है म्हारा जायौडा भी मने ...
म्हारै नाम सु लोग क्यु वट खावै है...
म्है कांइ बिगाडियो आ लोगां रो..
क्यं भुलणी चावौ हो म्हने .
मै थाकैं बडैरा री यादगिरि हुं..

Saturday, May 21, 2011

गोहत्या

में म्हारे नुवे घर आयो हो 

सुबे घर सामी घूम रियो हो 

`धोय धोय......'
जोयो ,लिलिसब्जी री दुकान वालो लाठी सु गाय ने कूट रियो हो गाय मुंडे माय सब्जी चबाती दोड रेई ही 

में kiyo  "अरे बिरजू भाई क्यों मारो हो ? गाय है । गाय माँ जेडी हुवे है ।"

"अरे बाबूजी ,इ तो नाक माय उगली कर दी है ,नि जाने कठे सु आवे साग सु मुंडो भर ने दोड जावे हेरान कर दिया ।आ १ कोणी घणी है एडि ,जिण ने दूध देवे उन री माँ है ,पण म्हारी तो रोजी रोटी खोस लेवे है ।"

" बिया क़िरी गाय है ? रोळ तो कोनि ?

" ठा कोनि , बाबूजी ।घणी है,लोग दूध दुह`र छोड़ देवे खावो -कमाओ ;आखो दिन अठे म्हाने खावे । लागे है आ गाय फजारी जी महाराज री है । "

" फजारी जी महाराज कुण ? "

" बाबूजी , फजारी जी कानजी रे मंदिर वाला पुजारी जी "

"अरे बे तो घणा धर्मी है । दिन्गे गाय रे खुजालिया करे ,जने गाय पिशाब करे -पिशाब महाराज पीवे " कने उभा दुकान वाला भाई जी बोल्या 

"इयु गाय रो पिशाब पीवे " इचरज सु सब्जी वाला भाई जी बोल्या 

" हा लाधू , इमे इचरज की के बात है .गाय रो पिशाब पीवन सु सगळा पाप धुल जावे गाय रो पेशाब तो पवित्र होवे है " दुकान वाला भाई जी बोल्या 

"यु है के  "

"हा, इतो ही नि ,सवाथ रे खातर ओ लाभदायक भी है ।" दुकान वाला वैज्ञानिक री बुधि वापर'र बोल्या 

" अरे बाबूजी ,कई भी हुवे है तो पिशाब इ'एज ,पिशाब कोई पीवन री चीज है "

"में हंस'र बोल्यो "थे ठीक केवो हो भाई जी ;जे पीवे है बिया ने ही ठाव है पूछो तो केय'सी ओ तो अमृत है "

दुकान वाला भाई जी होले से  गिसक लिया 

जोयो गावड़ी मुंडे माय सब्जी चाब्ती सामी जोवे ही सरीर माथे गेडिया री लकीर दीखे'ही 

मने दया आय'गी  सब्जी वाले ने में फटकार दिनी "तने दीया कोनि आयि जो बापड़ी रे शारीर माथे धारिया मड'गी है "

"में कई करू,बाबूजी ,गौ ने कुण मारनो चावे है ? पेला तो घणी'वार टाल करतो पण आब आ मार खाया बिना आगी ही नि जावे है 
अर गजब री बात आ है'क दूध पीवे फजारी जी महाराज ,दूध रो वायपर करे फजारी जी महाराज पालन-पाषण करे दूजा । पण म्हारी सब्जी खा जावे रोज री १ किलो मतलब प्याज टमाटर ८० रूपया ।"

"कई बे ढूध बेचे है "

"हा, म्हारे पड़ोसिय रो दूध बठे सु ही'ज आवे है "

मने मन में आई की बापड़ी गाय ने थोड़ी सी लाड सु सहलावनी । में आगू बढ्यो ,पण गाय मने देख'ने फुफ्ककर सींग ऊँचा करिया । में पाछो आ'यगो डर'र 

थोड़ी सी देर बठे रुक्यो देख्यो दूजो सब्जी वालो दूजी गाय ने गेडिया देवतो दोड़ा रियो हो ......

इ'तरिया गया रो आवनो ,जावनो ,गेडिया मारण री रमत चाल रेई ही 

जने देख्यो गौ महिमा वाला गीत बजावता १ बेल गाडियों आय रियो हो । बेलगाडी ने १ नेनो बलध खीच रियो हो  । गाडियों ३ बाजु सु रंगीन कपडे सु ढकियोड़ो  हो .लारली बाजु खुली ही.उण माय कई'क देवी देवताओ रो तस्वीर दिख रेयी'ही .लारे १ छोटी सी गावड़ी आय रेयी'ही ,बन री पीठ माथे खुदरो सो छोटो पग उगियोड़ो हो साथै दो साधू रे वेश  माय २ आदमी चाल रिया हा 

गाडियों म्हारे कने आय'र  रुक्यो 

"कई है, भाई "

"गाय माता रा दर्शन करो."

"सो तो में कर रियो हु । जुवो, म्हारे सामी कितरी उभी है ,सगलिया ने में देख रियो हु ।"

"अरे ,आ तो सुरभि गौ है , महाराज ।"

"हा ,इन'रो सरीर विकृत है."

"आप विकृत केवो हो ! अरे ,वेदा माय लिखियोड़ो होवे है की इसि गाय देव-गाय हुवे है दर्शन करण सु पुन -लाभ होवे है "

 "थाने तो दर्शन हो गिया है आब इने घुमाता क्यों फिरो हो ? किस्ये वैद माय लिख्योड़ो है बतावो तो मने भी ठा तो पड़े "

"आप बात नी समझ रिया हो ...।"

"में सब समझू हु ,आप आगू हालो धर्म रे नाम माथे किण दूजा ने बनाव्जो."

बे रवाना हो गिया बठे सु । नै जाणे मन माय किती गालीया काढी हवेला 

म्हारे मकान रे लारले पासे दुजा पण मकान बण रिया हा.। नुवो मकाना सामी रोड. माथे रेत नाखियोडी छी. । गाया रा टोळा रात्री विचरण बठे करे छे.। दिनगे आसे-पासे गोबर ही गोबर देखाळो देवे. अलख सुबे गाया अठे सु उठर सायद आपरे धणीया रे घरे जावे छे. बठे सु दुध दुहाय, रोटी वसुलण खातर निकळ जावे घरा सामि. बारी बारी सु आवे दरवाजे माथे उभे. । गाया ने बासी रोटी देया लोग त्रिप्त हो जावे . सुबे-सुबे धर्म होय गियो .गाय रो गोबर पवित्र हुवे जणे सड.का माथे गाया रो गोबर पड.यो रेवे . कोइ पण दर्खास्त कोंनी करे ।अजी तक आ मोहल्ले माय सफ़ाइ खातर कोइ व्य्वस्था कोंनी इण खातर बिख्रिरीयोडे. गोबर सु बास आय रेयी छी. में केइ बार सफ़ाइ री बात करी लोगा सु पण लोग टाळ देवे . आडी बात नाख. .इण रा केइ कारण है. अठे घणा व्यापारी है. इणाने टेम नी मिळया करे सड.क जोवण रो .। आसे पासे वाळी दुनीया , सड.का सु

बाने कोइ मतलब कोंनी . गोबर आफ़ी सुखे . । अर धर्मपरायण मीनख आसानी सु बिचे होय’र नीकळ जावे म्हारो जीवणो तो आ लोगा मुस्किल कर दीनो. आ गाय मातावां म्हारे पेड. पौधा ने खावे अर मने आखो दिवस हैरान करै . । गाय मातावा आवता-जावता म्हारे मकान रे आगे छोटी सी जिग्या माय उगायोडा फ़ुल अर सीसम रा पोधा रो हरण कर लेवे . कणे नजर चढे जणे तगड. देवतो नी तो खाय जावती .। जणे मन माय खीज आवती ऎकर मैं सुबह घुम’र आयो तो देखु की फ़जारी जी महाराज री गावडी. दौनो टागा कांटा वाळी तार माथे दियोडा अर आराम सु सीसम री डाळ माथे आयोडा दो चार पानडा. खाय रेयी छी. सखरो १ लठ जोयो , लेय ने गावडी लारे दोडयो दो चार मोरा माथे मेल दीनी . बा गावडी दोडी सब्जीवाळे कानी मे भी लारे लारे .।
" काइ हुयो बाबुजी.?" सब्जी वाळो भाइ बोल्यो ।
" आ गावडी म्हारी पण सब्जी खाय गयी. । "
" तो काइ हुयो गाय तो माता हुवे है खावण देवो बापडी ने " बो खिल’र बोल रेयो हो मने महसुस होयो क आ भाइजी उण दिन रो जवाब दे दीनो.
पाछो आयो घरे मन माय सोच्यो आ बापडी गाया रो कै दोष ? जो आ रो दुध खावे दोष बाने . आ री तो आदत है लिलो खावण री . कसुर दारा ने आप कै केवा कोनि अर आं बापडी गाया माथे लठा नाखां . ।
मन मायली रीस उतर गयी .।


१ दिन में  ऑफिस सु आ रियो हो जोयो,रस्ते माथे भीड़ लागियोड़ी देखि । कने गियो तो ठा पड़ी फजारी री गाय मर गी । उणरे मुंडे सु लोई (खून) निकल रियो हो । मिनख तरिया तरिया रा अनुमान लगा रिया हा -किण मारी ? क्यों मारी ?कुन हो सके ?गौ हत्या जेड़ो घिनोनों पाप किण करियो होई । लागे किण जहर दियो है । ठा लगार बिण आदमी ने सजा देवणी चाहिजे 


लोग सगळा चुप चाप बैठा हता फ़जारी जी री आखिंया मायने आसु हा ।
मैं बोल्यो
"" मने ठा है , इण गाय ने कुण मारी

 "किण मारी " सगळा हबकर बोल्या ।
मैं चुप होय्गो ।
 सगळा बोल्या " बतावो नी कुण मारी
"जिण री गाय है, उणा इज मारी है.।"
" गाय तो फ़जारी जी री है.।"
"मने नी ठाव पण जिण री है उण इज मारी है.
"अरे इता धर्मी आदमी आपरी गाय री हत्या करे ? केडी फ़ालतु बातां कर रिया हो थे. ! "
"करे कोणी पण कर दीनी । इणा सु पुछो गाय ने दुहर गावं माय छोड देवे लोगा ने किता परेशान करे है. अर शाम ने लठा रा घाव नी दीखे है शरीर माथे "
"अरे, था जेडा नास्तीक लोग उल्टी बाता करे है.? गौ माता है काइ खा लियो तो उण सु लोग हत्या तो नी कर देवे . आ तो घोर अधर्म है."
"मैं सब समझु हु, पण काइ आ धर्म है दुध दोयर बहार तगड देवो , किण बेटे मा री हत्या करी है ठाव नी पण जो बेटो जिम्मेवार है जीमेवार फ़जारी जी है."
साची केया मा माथे माथे देवे है बा ओखाणो मने याद आयो . मने ठा पडगी के लोगा ने म्हरी बात खोटी लागी है .। बे भड.क जासी . मे बठे सु रवानो होयो बोलो बोलो.
लारे धीमी आवाज सु लोग बोल्या " बडो कोजो बोले है . गजब को है. अधार्मीक है."
मन माय आयी पाछो घुम’र केय देवु- ‘भाइजी आ बात थाकी समझ माय कोनी आवै . जावो लठा मरावो गौ रे अर धर्म रे नाम माथे कीडिया ने आटो अर गाया ने झुठी रोटी खुळावो'

Sunday, January 16, 2011

"मा कै’यां मुंडो भरीजै"

बस सवारिया सु भारियोड़ी ही. भूरे  री मीठ सामली सीट माथे गई  बी सीट रे खूने  माय सात साल रो टाबर भेलो होयर बेठो हो..अर कने एक थेली पड़ी ही यूरिया वाली गुणी री
बो बोल्यो.."टींगर थारे साथै और कुण आवन वालो है "टाबर जवाब कोनि दियो अर सीट सु खडो हो गियो डर र कई बोल्यो कोनि. भूरो समझ गियो क इरे साथै कोई है.एकर सोच र पछे आपरी माँ ने दूजी सीट माथे बिसान दी .आडो आव्लो  जोयो कोई सीट खाली कोनि ही जने आप खडो हो गियो !
चालक साहेब आया बस चालू करी बो टाबर रोवन लाग्यो .खलासी सीटी बजाई एक ओरत भाज र बस माय चड़ी सीट माथे पड़ी थेली उठा र टाबर ने गोद्या लियो अर चुप करावन लगी .टाबर ने गुड री भेली दी टाबर बोलो हो गियो | माँ रे गले माय हाथ नाख र सु गियो बी  रो  मुंडो ख़ुशी सु खिलियोड़ो हो माँ री छत्र  छाया रो.......
"माँ, मै सीट माथे बेस जावू ,तू थाक जावेला"
" ना   बेटा ,माँ बाप तो पूरी उम्र ओलाद रो भार उठावे तो भी नि थाकेला ,तू सु जा बेटा."    
माँ बिने छाती सु लगा लियो .
भूरो जने बस माय चढ्यो जने बी माँ बेटे ने ही देख रियो हो बिने बा री बाता सु जोर रो झटको लाग्यो
एकदम बी री नजर आपरी बुडी माँ माथे गई .माँ भिगियोड़ी अंखिया सु खिड़की सु बारे देख रेई ही...
भूरे ने याद जुनी बात याद आई बीरी माँ बिने कितो लाड  देवती ..भाभोसा चाल्या पछे माँ भगवन सु किती अरज कर र लियो हो मने .किता दुःख देख र मने भनायो , लिखायो मोटो करयो.मने कई भी चीज री तंगी नि आवन दी जड़ तक भूरे ने नि देखती या बिने खानों नि खुलावती खुद नि खावती.. पछे धूम धाम सु ब्याव करयो ..बिरे जन्म रा दिन बिने याद आवन लगा ..............
सोचतो गयो.
..........................धुबन  लाग्यो जोर सु
.
.............................अंख्या माय आसू आ गिया बोल्यो घर री लुगाई रे डर सु बो माँ ने अनाथ आश्रम छोडन  जावे जलम देवन वाली माँ ने .......... 
.................................................................एका एक जोर सु बोल्यो " डलेवर साब बस रोक्जो "
बस रुकी माँ रो हाथ पकड़ ने माँ बेटो दोनों सागे निचे उतर गिया
जिया ही घरे पुगया लुगावदी  मुंडो कोजो करयो अर बोली."पछि ले न आ गियो " बो चुप हिज रियो  १२ साल री उम्र रो भूरे रो छोरो बोल्यो " पापा जने मै आप दोना ने अनाथ अस्राम छोड़न जासु जने  साथै दादीसा ने भी ले चालसा "
भूरे आपरी लुगाई सामी जोयो शायद बिने आपरी गलती रो अहसास  हो गियो हो..           





                                                                                                   आपरो :
                                                                                                           शंकर सिंह राजपुरोहित
                                                                                                           राज बीकानेर
                                                                                                           9228400400

सियालो.......

इन रुत रा जै घर सु निकलसो..
                               तो सर्दी सु सिकुड़ जावसो !!
                                कई क रुत है सियाले री
कतरी सर्दी पड़े है जिया आ सर्दी ही
                             सियाले री वर्दी पैर र आई है !!
जने निकले सूरज रो तावड़ो
                                  जने  होवे सगळा री मनमानी !!
सूरज री गर्मी सु मिळे गर्मी
                                  जने कई काम होवे !!
                               कई क रुत है सियाले री
बात करा रात री जने..
                                 याद आवे गुदडा  री !!
                               कई क रुत है सियाले री
विनती है सगळा सु घणो धयान राखजो
                              किया क दोरा लागसी दास साब रा टिका !!
                              कई क रुत है सियाले री
                                                                     आपरो ::शंकर सिंह राजपुरोहित बीकानेर

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