Sunday, January 16, 2011

"मा कै’यां मुंडो भरीजै"

बस सवारिया सु भारियोड़ी ही. भूरे  री मीठ सामली सीट माथे गई  बी सीट रे खूने  माय सात साल रो टाबर भेलो होयर बेठो हो..अर कने एक थेली पड़ी ही यूरिया वाली गुणी री
बो बोल्यो.."टींगर थारे साथै और कुण आवन वालो है "टाबर जवाब कोनि दियो अर सीट सु खडो हो गियो डर र कई बोल्यो कोनि. भूरो समझ गियो क इरे साथै कोई है.एकर सोच र पछे आपरी माँ ने दूजी सीट माथे बिसान दी .आडो आव्लो  जोयो कोई सीट खाली कोनि ही जने आप खडो हो गियो !
चालक साहेब आया बस चालू करी बो टाबर रोवन लाग्यो .खलासी सीटी बजाई एक ओरत भाज र बस माय चड़ी सीट माथे पड़ी थेली उठा र टाबर ने गोद्या लियो अर चुप करावन लगी .टाबर ने गुड री भेली दी टाबर बोलो हो गियो | माँ रे गले माय हाथ नाख र सु गियो बी  रो  मुंडो ख़ुशी सु खिलियोड़ो हो माँ री छत्र  छाया रो.......
"माँ, मै सीट माथे बेस जावू ,तू थाक जावेला"
" ना   बेटा ,माँ बाप तो पूरी उम्र ओलाद रो भार उठावे तो भी नि थाकेला ,तू सु जा बेटा."    
माँ बिने छाती सु लगा लियो .
भूरो जने बस माय चढ्यो जने बी माँ बेटे ने ही देख रियो हो बिने बा री बाता सु जोर रो झटको लाग्यो
एकदम बी री नजर आपरी बुडी माँ माथे गई .माँ भिगियोड़ी अंखिया सु खिड़की सु बारे देख रेई ही...
भूरे ने याद जुनी बात याद आई बीरी माँ बिने कितो लाड  देवती ..भाभोसा चाल्या पछे माँ भगवन सु किती अरज कर र लियो हो मने .किता दुःख देख र मने भनायो , लिखायो मोटो करयो.मने कई भी चीज री तंगी नि आवन दी जड़ तक भूरे ने नि देखती या बिने खानों नि खुलावती खुद नि खावती.. पछे धूम धाम सु ब्याव करयो ..बिरे जन्म रा दिन बिने याद आवन लगा ..............
सोचतो गयो.
..........................धुबन  लाग्यो जोर सु
.
.............................अंख्या माय आसू आ गिया बोल्यो घर री लुगाई रे डर सु बो माँ ने अनाथ आश्रम छोडन  जावे जलम देवन वाली माँ ने .......... 
.................................................................एका एक जोर सु बोल्यो " डलेवर साब बस रोक्जो "
बस रुकी माँ रो हाथ पकड़ ने माँ बेटो दोनों सागे निचे उतर गिया
जिया ही घरे पुगया लुगावदी  मुंडो कोजो करयो अर बोली."पछि ले न आ गियो " बो चुप हिज रियो  १२ साल री उम्र रो भूरे रो छोरो बोल्यो " पापा जने मै आप दोना ने अनाथ अस्राम छोड़न जासु जने  साथै दादीसा ने भी ले चालसा "
भूरे आपरी लुगाई सामी जोयो शायद बिने आपरी गलती रो अहसास  हो गियो हो..           





                                                                                                   आपरो :
                                                                                                           शंकर सिंह राजपुरोहित
                                                                                                           राज बीकानेर
                                                                                                           9228400400

7 comments:

  1. bahut hi chokhi gyan devan wali kahani hai....

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  2. भाई शंकर जी,
    आपरो ब्लोग आपरै आदेस मुजब देख्यो !
    सांतरी कोसिस है !
    आप भाषा माथै ध्यान दिराओ !
    भोत गळत्यां है !
    उंतावाळ री जाग्या थ्यावस री दरकार है !
    भाषा रै किणीं जाणकार रो सरणो लेवो -तो ठीक रैसी !
    आपरी आ ओळी-"माँ केइजे जने मुंडो भरीजे"
    जे इय़ां होंवती तो कियां रैं’वती-
    "मा कै’यां मुंडो भरीजै"
    बाकी भोत बातां है । फ़ेर कदै ई !
    लाग्या रैवो-ढब बैठ जासी !

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  3. प्रिय शंकर,राजस्थानी भाषा को आगे बढाने का आपका प्रयास अत्यंत सराहनीय है.

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  4. व्हाला भाई शंकर सिंह राजपुरोहित जी,
    जै राम जी !

    राजस्थानी भाषा नैं आगै बढावण खातर गीरबैजोग सरावण लायक काम जरूरी है, आप इण दिस पग धरिया हो आछी बात है … ओमजी कागद इशारा दे ही दीन्हा ।
    राजस्थानी रै नांव पर घणो खेल चालै भाई !
    निरणै आपनैं ही करणो है , भलां छदम रचनाकारां री लांबी लिस्ट में रळ जावो , का थावस सूं ठोस सिरजण करण वाळा सुरसत रा साचा सपूत बणो ! … बुरो मत मानजो सा !

    मा कै’यां मुंडो भरीजै कहाणी आछी है , बधाई !

    …और श्रेष्ठ सिरजण खातर मंगळकामनावां है ।

    शुभकामनावां सागै
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  5. Shankar Singh ji
    bhot he badhiya sa. rajasthani bhasa me aur bhi chokha aalekh the likhta revo aaej mangalkamnava hai. Jai babe ri, babo bhali kare.

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  6. संवेदनशील मन की सटीक अभिव्‍यक्ति। मां कहने से सच में मन भर आता है...

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