Friday, May 27, 2011

मरुवाणी

क्युं सतावो हो म्हने भारत वाळा
मैं पेला सुं भी घणी तंग होयोडी हुं...
जीवन म्हारौ खतरै मांय है....
मने ही क्युं मीळ्या आ दुःखा रा टोळा
अजी भी बाकी है कांइ म्हारे माथे जुल्मा रा झोळा
कांई भर देवणी चावौ हो म्हारी कोथळी दुःखा रे दहेज सु..
मत सतावौ म्हने भारत वाळा मैं पैला सुं ही परेशान हुं...
भुलै है सगळा मने म्हारा मीत.. मीटावणी चावै है मने ..
पांतरै है म्हारा जायौडा भी मने ...
म्हारै नाम सु लोग क्यु वट खावै है...
म्है कांइ बिगाडियो आ लोगां रो..
क्यं भुलणी चावौ हो म्हने .
मै थाकैं बडैरा री यादगिरि हुं..

1 comment:





  1. मरुवाणी खातर आपरी पीड़ सगळां री पीड़ है …
    शंकर सिंह राजपुरोहित जी !

    नूंवी रचना में मात्रावां री सावधानी री अरज है …

    शुभकामनावां !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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